उत्तराखंड

बद्रीनाथ धाम में ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव’ पर विवाद

!!बद्रीनाथ धाम में ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव’ पर विवाद!!
(डॉ कमल किशोर डुकलान ‘सरल’)

उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में स्थित चार धाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) भारतीय सनातन संस्कृति में आस्था,तपस्या और आत्मिक शुद्धि के सबसे बड़े केंद्र माने जाते हैं। चार धाम एक धार्मिक परिक्रमा नहीं,बल्कि मनुष्य की श्रद्धा और संयम की परीक्षा और साधना का मार्ग हैं।
आदि शंकराचार्य द्वारा परिभाषित,प्रत्येक धाम एक विशेष युग का प्रतिनिधित्व करता है।

हाल ही में बदरी-केदार मंदिर समिति द्वारा अराइवल प्लाजा में विगत 19 और 20 सितंबर 2026 को ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया था, जिसमें तेज आवाज में डीजे पर संगीत बजाए जाने पर विवाद खड़ा हो गया था।

बद्रीनाथ धाम में ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल’ के दौरान डीजे और तेज संगीत पर हुए कार्यक्रम के वायरल वीडियो पर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और आम जनता में इस पर तीखी और आक्रोशित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

बद्रीनाथ धाम हिमालयी और संवेदनशील इको-जोन में उच्च डेसिबल (High-decibel) साउंड सिस्टम और भारी भीड़ से ग्लेशियरों और पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील क्षेत्र है, जिससे शोर-शराबे से इस पर बुरा असर पड़ता है। सोशल मीडिया पर यूजर्स का प्रतिक्रिया देने का एक ये भी कारण है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी ने बद्रीनाथ धाम में डी जे और तेज गति के संगीत पर इसे धाम की आध्यात्मिक पवित्रता पर सीधा हमला बताया और इस प्रकार के आयोजनों पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की। बद्रीनाथ धाम में शांति और ध्यान का एक विशेष महत्व है, वहां ऐसे आयोजन धार्मिक परंपराओं पर एक आघात हैं।

उत्तराखंड सरकार के धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री श्री सतपाल महाराज ने बदरीनाथ धाम में हुए डीजे कॉन्सर्ट और सांस्कृतिक कार्यक्रम का बचाव करते हुए कहा है कि वहां संगीत पर कोई प्रतिबंध नहीं है और वह एक सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध है।

विवाद के दौरान सतपाल महाराज ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यह भी कहा कि मंदिर के गर्भगृह में पूजा के दौरान शंख का उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि वह जानवर की हड्डी का होता है (या धार्मिक मान्यताओं के कारण वर्जित है), जबकि मंदिर के बाहर इसे बजाया जाता है। इस पर संत समाज व तीर्थ पुरोहितों ने नाराजगी जताई है। धर्मस्व मंत्री द्वारा शंख को जानवर की हड्डी का बताये जाने वाले बयान को संत एवं तीर्थ पुरोहित समाज ने हास्यास्पद और धार्मिक परंपराओं के खिलाफ बताया है।

आपको बता दें कि शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले चौदह रत्नों में से एक रत्न के रूप में हुई थी। समुद्र मंथन में निकले अमृत के वितरण के माता लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं,इसलिए शंख को माता लक्ष्मी का भाई माना जाता है। शंख का भगवान विष्णु से गहरा रिश्ता है।

शंख भगवान विष्णु का प्रिय वाद्य के रूप में माना जाता है। अट्ठारह पुराणों में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख के मध्य भाग में वरुण देवता का वास, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा जी और अग्र भाग में गंगा तथा सरस्वती का निवास माना जाता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि को ब्रह्मांड की पहली आवाज यानी ‘ॐ’ (Om) का प्रतीक माना जाता है।

भगवान विष्णु द्वारा इसे धारण करने से उन्हें ध्वनि के देवता के रूप में भी दर्शाया जाता है। किसी भी धार्मिक कार्य में देवताओं के आह्वान में शंक ध्वनि वाद्ययंत्र के रूप में बजाई जाती है। भगवान श्री बद्रीनाथ में डी जे पर नाच गानों पर मचे बिवाद पर उत्तराखंड के संस्कृति एवं धर्मस्व मंत्री के रूप में बिवाद पर बयान समझ से परे है।

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