उत्तराखंडदेहरादून

सात मोड़ पर पेड़ कटान के खिलाफ आवाज बुलंद, पर्यावरणविदों ने सरकार को चेताया—बढ़ेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष

​ऋषिकेश सात मोड़ पर पेड़ कटान का भारी विरोध, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ता और युवाओं ने चेताया—हाथियों का हैबिटेट तबाह होने से बढ़ेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष

वक्ताओं का सवाल: जब नेपाली फार्म-देहरादून फोरलेन हाईवे (NH-7) पहले से मौजूद, तो एनएचएआई दूसरा हाईवे क्यों बना रहा है?

वक्ताओं ​ने दिया विकल्प—हाथियों की सुरक्षा के लिए सात मोड़ मार्ग पर रात 8 से सुबह 6 बजे तक बंद हो यातायात, नेपाली फार्म रूट का हो इस्तेमाल

देहरादून, : देहरादून प्रेस क्लब में आज पर्यावरण प्रेमियों और ऋषिकेश व देहरादून से आए स्थानीय लोगों ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता का आयोजन किया। यह वे लोग हैं जो दो, तीन हफ्तों से ऋषिकेश के सात मोड़ पर पेड़ कटान के विरोध में लगातार डटे हुए रहे। प्रेस वार्ता में मुख्य रूप से ऋषिकेश से आए वक्ताओं ने सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हो रहे इस विनाश पर गंभीर चिंता व्यक्त की और सरकार के विकास के दावों पर कड़े सवाल उठाए।

पर्यावरणविद् हिमांशु अरोड़ा ने ​प्रेस वार्ता प्रारम्भ करते हुए विकास के मॉडल पर ​गंभीर सवाल उठाते हुए कहा, “हम लगातार वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। एक तरफ ऋषिकेश सात मोड़ की सड़क को फोरलेन या सिक्सलेन करना और दूसरी तरफ थानों की सड़क का चौड़ीकरण करना—यह हाथियों को चारों तरफ से कंक्रीट के जाल में घेरने जैसा है। अगर हम उनके रहने की जगह और चलने के रास्ते छीन लेंगे, तो जानवर आखिर जाएंगे कहां? मजबूरन वे इंसानी बस्तियों का रुख करेंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगा।”

​अनूप नौटियाल ने आरटीआई से मिले ​गंभीर आंकड़ों का संदर्भ देते हुए ​कहा, “पिछले 2​5 वर्षों में जब से उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ है, तब से लेकर अब तक उत्तराखंड प्रदेश के समस्त जंगल ​के कटान का 47 प्रतिशत हिस्सा अकेले देहरादून जिले में हुआ है । अगर महज 25 सालों में ​देहरादून में इतने व्यापक स्तर पर पेड़ों और जंगलो को कटान हुआ है।

तो आने वाले वर्षों में बचा हुआ जंगल भी पूरी तरह साफ कर दिया जाएगा। इसके बाद देहरादून सिर्फ एक कंक्रीट का जंगल बनकर रह जाएगा।​” उन्होंने इस कथित विकास के मॉडल को पर्यावरण संहार​ की संज्ञा दी।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए ​ऋषिकेश की पर्यावरण कार्यकर्ता शैफी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमें किसी भी कीमत पर जंगलों और पेड़ों का कटान मंजूर नहीं है। जिस सात मोड़ की सड़क को चौड़ा करने की बात की जा रही है, वहां यातायात का कोई भारी दबाव नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह क्षेत्र हाथियों का एक बेहद प्रसिद्ध और प्रमुख गलियारा है।​” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सड़क निर्माण कार्य शुरू हुआ, तो अगले 4-5 वर्षों तक जंगल में जो अशांति पैदा होगी, उससे हाथी ​और अन्य जानवर अपनी जगह छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे। वक्ताओं ने हाल ही में डोईवाला में हुई घटना का हवाला देते हुए कहा कि वहां महज एक-दो दिन पहले ही हाथी के हमले में एक व्यक्ति की जान चली गई। अगर सात मोड़ पर पेड़ काटे गए, तो हाथियों के भटकने के कारण इस तरह की घटनाएं और तेजी से बढ़ेंगी।

प्रेस वार्ता में एनएचएआई की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए शिल्पी ने कहा, “जब एक तरफ नेपाली फार्म से देहरादून जाने वाला फोरलेन हाईवे पहले से ही शानदार स्थिति में मौजूद है, तो ठीक उसी के समानांतर एनएचएआई द्वारा दूसरा एनएच-7 हाईवे क्यों और किस फायदे के लिए बनाया जा रहा है? यह सरकारी धन और पर्यावरण दोनों की खुली बर्बादी है।”

इस समस्या का एक बेहद व्यावहारिक समाधान सुझाते हुए कार्यक्रम की वक्ता ओमिनी ने कहा, “यह मार्ग वन्यजीवों के लिए बेहद संवेदनशील है। जैसे आज से 50 वर्ष पहले ऋषिकेश से देहरादून का यह रास्ता रात के समय बंद कर दिया जाता था, ठीक उसी तरह आज भी हम इसे रात 8:00 बजे से लेकर सुबह 6:00 बजे तक यातायात के लिए पूरी तरह बंद कर सकते हैं।

इससे वन्यजीवों को रात के समय सुरक्षित आवाजाही का मौका मिलेगा। इस दौरान रात का सारा यातायात आसानी से नेपाली फार्म-देहरादून फोरलेन सड़क की तरफ डायवर्ट किया जा सकता है।”

वहीं, नितिन ने सड़क को सीधा करने और दुर्घटनाएं रोकने के सरकारी दावों को आंकड़ों के साथ खारिज किया। उन्होंने कहा, “अगर प्रशासन को लगता है कि सात मोड़ को खत्म करके सड़क सीधी करने से दुर्घटनाएं रुक जाएंगी, तो यह पूरी तरह गलत है। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली-जयपुर हाईवे और दिल्ली-आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे जैसे जितने भी नए फोरलेन या सिक्सलेन एक्सप्रेसवे बने हैं, वहां आए दिन भीषण हादसे होते रहते हैं। चौड़े हाईवे बनने से वाहनों की रफ्तार बढ़ती है, जिससे दुर्घटनाएं घटती नहीं बल्कि और अधिक बढ़ जाती हैं।”

सात मोड़ को बचाने के अपने प्रयासों के अंतर्गत ​युवाओं ने आगामी एक महीने की रणनीति और कार्यक्रमों की रूपरेखा भी साझा की​।​ 15 अगस्त के अवसर पर ​सात मोड़ पर विशेष जागरूकता एवं देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।​ यहाँ से बाइक रैली भी गुजरेगी। रक्षाबंधन पर पेड़ों को बचाने का संकल्प लेते जंगलों में पेड़ों को रक्षासूत्र बांधने का अनोखा कार्यक्रम आयोजित होगा।

9 सितंबर ​ को हिमालय दिवस के उपलक्ष्य मे “यह कैसा हिमालय दिवस?” शीर्षक से एक वृहद कार्यक्रम आयोजित कर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए जाएंगे। इसके अलावा, प्रत्येक रविवार को सातमोड़ पर पेड़ कटान के विरोध में नियमित प्रदर्शन और जागरूकता अभियान जारी रहेंगे।

प्रेस वार्ता के अंत में सभी वक्ताओं ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा को ताक पर रखकर किए जा रहे इस सड़क चौड़ीकरण के फैसले को तुरंत वापस लिया जाए, अन्यथा इस आंदोलन को और तेज व व्यापक किया जाएगा।​ प्रेस वार्ता में जया सिंह, इरा चौहान, रूचि सिंह, अनीश लाल, संजय, वासु खन्ना, शिल्पी, कनीश उपस्थित रहे।

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